दिव्यांग आरती कुमारी लड़कियों की प्रेरणा बनी। हिम्मत नही हारो, जीत हासिल करो।

By Anonymous
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आरती कुमारी और उनकी माता-पिता

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कहते हैं कि सफलता बिन बुलाए मेहमान की तरह कभी नही आती हैं बल्कि उसे अपनी लगन और अथक परिश्रम से आने के लिए मजबूर करना पड़ता हैं। जिसका जीता जागता मिसाल आरती कुमारी हैं। जिन्होंने दोनों पैरों से 60% से भी अधिक दिव्यांग हैं और शादी-शुदा होने के बावजूद भी अपनी पढ़ाई जारी रखी और अपने घर-परिवार को संभालते हुए अपनी कड़ी मेहनत और लगनशीलता के कारण डिप्लोमा-सर्टिफिकेट प्रवेश प्रतियोगिता परीक्षा [DCECE]-2017 के पर मेडिकल (इंटर स्तरीय) की परीक्षा में बाजी मारी। आरती बताती हैं पहले दो बार असफल की भी सामना करना पड़ा लेकिन हिम्मत नहीं हारी और तीसरी बार सफलता को हासिल कर ही लिया। लेकिन आगे एक बार फिर से निराश होना पड़ा क्योंकि अपनी वर्ग में अच्छे रैंक-23 आने के कारण पारा मेडिकल (इंटरमीडिएट स्तरीय) : PM (Staff Grade-A Nursing / A.N.M. Nursing के लिए प्रथम काउंसलिंग की प्रथम दिन ही बुलाया गया था। लेकिन गांव में न्यूज़ पेपर/इंटरनेट नही होने के कारण सही समय पर सूचना नही मिली। जिसके वजह से पहली काउंसलिंग छूट गयी। लेकिन दूसरी काउंसलिंग में फिर से इनकी चुनाव हुआ और GRADE-A NURSE, कोर्स P.M.G के लिए G.N.M School, शेखपुरा (बिहार) कॉलेज में दाखिल मिला गया।

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आरती अपने परिवार के बारे में बताती हैं "मेरी पढ़ाई अपनी ही गांव-धरहरा, थाना-बेलागंज, जिला-गया(बिहार) के  सरकारी स्कूल से ही शुरू हुई। पिता जी (यदुनंदन विश्वकर्मा, जाति-लोहार) एक साधारण किसान हैं लेकिन शिक्षा के प्रति बहुत जागरूक हैं। अपने सभी कामो में सबसे पहले शिक्षा की महत्व देते है। उन्होंने कभी भी हमारे भाइयों-बहनों को शिक्षा पर खर्च और समय देने से पीछे नही हटे बल्कि सबसे आगे रहे। कभी भी बेटा और बेटी में कोई भेद भाव नही रखे। सबको एक समान शिक्षा-दीक्षा दिए। अन्य परीक्षा और पारा मेडिकल की फॉर्म भरने से लेकर नामांकन प्रक्रिया तक हमेशा साथ दिए। मेरी माँ का भी काफी अहम भूमिका रहा हैं। मैं पांच भाई-बहन में सबसे छोटी हूँ। सबसे बड़ी दीदी- अनु शर्मा, अंजू शर्मा, और बडे भाई- पवन शर्मा(भारतीय रेल सेवारत), श्रवण शर्मा(राज्य सेवारत) हैं। जब हम लोग घर पर पढते थे तो माँ प्रतिदिन सुबह में चार बजे जगाकर पढ़ने बैठा देती थी और खुद जगकर वही बैठी रहती थी। अगर गलती से भी नींद की झपकी आई तो फिर खैर नहीं, डाँट और पिटाई शुरू। माँ जितना पढ़ाई के मामले में कड़ाई करती हैं उससे कही ज्यादा हम लोगों से प्रेम भी करती हैं।"

आरती की शादी उत्तर प्रदेश में उन्नव जिला के दौलत पुर गांव में हुई हैं। अपनी ससुराल वालों के बारे में बताती हैं- अक्सर शादी होने के बाद लडकिया पढ़ाई छोड़ देती हैं या ससुराल वाले रोक देते हैं लेकिन मेरे साथ ऐसा नही हुआ। जब मैं अपनी पति( रामलखन शर्मा) और सासु माँ के सामने आगे भी पढ़ाई की प्रस्ताव रखी तो उनलोगों को काफी खुशी हुई। सासु माँ तो अपनी बेटी जैसा मानती और व्यवहार करती हैं। वह कहती हैं "तुम सिर्फ बहू ही नही मेरी बेटी है। जब तक मैं हूँ तुम्हें अपनी माँ की कमी महसूस नही होने देंगे। तुम जब भी अपने आप को पाओगी तो ममता के छाव में ही" ससुराल वालों से भी बहुत सहयोग मिला।

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नर्सिंग में जाने का उद्देश्य पूछने पर आरती बताती है- "मैं दोनो पैरो से दिव्यांग होने के कारण जीवन में बहुत से मुस्किलो का सामना करना पड़ता हैं - चलने में ,अपनी काम करने में। फिर भी अपना काम खुद करती हूँ। जिससे लोगों के दुःख को समझ सकती हूं इसलिए मैं दुखियो और रोगियों को सेवा चाहती हूँ।" इस सफलता और सोच पर आज दोनो परिवार काफी खुश हैं। सफलता और ऐसी सकारात्मक सोच रखने के लिए पूरे समाज की तरफ से बहुत बहुत बधाई। आरती पर पूरे समाज को गर्व हैं। मैं आरती के माता-पिता को कोटि-कोटि तहे दिल से प्रणाम करता हूँ।

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लेख सार संदेश:-
★ हर बच्चे में एक चिंगारी होती हैं, उसे आग बनने के लिए सिर्फ थोड़ी सी हवा की जरूरत होती हैं। कौन जानता था आरती कल तक खुद की जिंदगी से पीड़ा सहने वाली आज दूसरे की पीड़ा हरने वाली बनेगी।

★ हर माता-पिता अपने सभी कामो में अपने बच्चे के शिक्षा-दीक्षा की प्रथम प्राथमिकता दे। उसके साथ कुछ समय दे, बाते करे, उसे क्या बनना है सुने और सहयोग करे।

★ बेटा-बेटी में कोई भेदभाव नहीं रखे। दोनो को शिक्षा-दीक्षा और हर साधन-सुविधा एक समान दे।

★ रूढ़िवादी कुरीतियों (बहू पर हुक्म चलना, दहेज के लिए प्रताड़ित और व्यंग करते रहना, चारदीवारी के अंदर बंद करके रखना) को त्याग कर बहू को अपनी बेटी जैसा माने क्योंकि बेटी की कोई निश्चित रूप नही। जिस रूप में देखे वहीं नजर आयेगी। आपकी बेटी भी किसी के बहू हैं या बनेगी। उसके साथ भी ऐसा व्यवहार हो सकता हैं।

— सतीश कुमार शर्मा
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