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बिना लड़ाई और संघर्ष के जीत?

पिताजी हथौड़ी / बसूला के उपयोग से जिस रुपये को कमाते हैं उस पैसे का जीन्स, पैंट व मोबाइल खरीदने में कभी शर्म नहीं आई होगी, लेकिन ये बताने में शर्म आती है की हम लोहार हैं। क्यों भाई किस बात का डर है? बिना लड़ाई और संघर्ष के जीत? आप घर से बाहर निकल कर देखिए कि बाहर क्या हो रहा है।

आप सभी भली भांति जानते हैं कि अधिकार चाहे जो भी हो लेकिन मांगने से नहीं मिलती, उसके लिए संघर्ष करना पड़ता है, लड़ना पड़ता है और तब आप विजेता घोषित होते हैं। लड़ाई में जीत भी हो सकती है और हार भी। लेकिन बिना लड़ाई और संघर्ष के जीत की कल्पना करना मूर्खता है।

पूरे 40 लाख से अधिक लोहार समुदाय हमारा परिवार है, और हम सब इस परिवार के हिस्सा। हममें से कोई भी शांत नही बैठ सकता। यदि वो ऐसा करता है तो अपने परिवार, अपनी आने वाली पीढ़ी और पूरे लोहार समुदाय का नुकसान करता है।

बिना लड़ाई और संघर्ष के जीत
जीत के लिए लड़ाई और संघर्ष जरूरी है

लड़ाइयां तीन प्रकार से लड़ी जा सकती हैं – तन से, मन से और धन से। यदि आप शरीर का उपयोग करके समुदाय के कल्याण के लिए कुछ कर सकते हैं तो कीजिये, वरना मन से करने में मत चूकिए अर्थात आप मानसिक रूप से समुदाय के मांगों का समर्थन कीजिये।

सोशल मिडिया प्लेटफार्म से निरंतर आवाज लगाते रहिए। मैं आज के लोहार समुदाय के युवाओं से कहना चाहूंगा कि अपने फेसबुक वॉल का प्रयोग केवल, डीपी डालने, लिपसिंक करने के लिए ही न करें, इसका प्रयोग अपनी बातों को लोगों तक पहुंचाने के लिए भी करें। यदि ऐसा नही करते है तो इसका अर्थ ये है कि या तो आपको अपने भविष्य से कोई लेना देना नही है या फिर आप डरते हैं कि लोग जान जाएंगे कि आप लोहार हैं और आपकी प्रतिष्ठा खराब हो जाएगी।

पिताजी हथौड़ी /बसूला के उपयोग से जिस रुपये को कमाते हैं उस पैसे का जीन्स, पैंट व मोबाइल खरीदने में कभी शर्म नहीं आई होगी, लेकिन ये बताने में शर्म आती है की हम लोहार हैं। क्यों भाई किस बात का डर है? इस बात का डर तो नहीं है कि जिसके साथ रात भर चैटियाते हैं वो लोहार जानकर नाराज हो जाएगी? ऐसा मत करिए मेरे युवा भाइयों।

आप घर से बाहर निकल कर देखिए कि बाहर क्या हो रहा है। खैर यदि आप तन और मन दोनों में से किसी मे सक्षम नहीं हैं तो धन से जरूर कीजिये अर्थात वितीय सहयोग। हमारा एक-एक रुपया 40 लाख रुपया बन सकता है और हम भारत की कोई भी कानूनी लड़ाई लड़ सकते हैं।

कुछ ठिककेदारो को हम कहते हुए सुने हैं की दिन भर में वे लोग हजार 2 हजार रुपये उड़ा देते हैं.। दो चार सौ का तो रजनीगंधा खाकर थूक देते हैं। मेरे पूज्यनीय भाई साहब, हम कहेंगे कि थोड़ा थूकना कम करके उसमें से समुदाय के लिए बचा लीजिये। इससे आपके आने वाली पीढ़ी का भविष्य अंधेरे में जाने से तो बचेगा।

अंत में मैं यही कहना चाहता हूँ कि आप अपनी और अपनी आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व तथा अपनी संवैधानिक अधिकार को बचाने के लिए अपने घरों से बाहर निकलिए, तन-मन-धन से लड़ाई का हिस्सा बनिये, शान से बोलिये मैं लोहार (Lohara) हूँ, सोशल मीडिया पर अपनी बात को लिखिए/बोलिये। आप खुद मीडिया बनिये, सोशल मीडिया ही अपना मीडिया है। धन्यवाद

जय लोहार, जय जोहार।
जय भारत, जय संविधान।।

Satish
Satishhttps://www.apnalohara.com/
सतीश कुमार शर्मा ApnaLohara.Com नेटवर्क के संस्थापक और एडिटर-इन-चीफ हैं। वह एक आदिवासी, भारतीय लोहार, लेखक, ब्लॉगर और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।
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